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दुर्गासप्तशती • अध्याय 5 • श्लोक 11
मेधासि देवि विदिताखिलशास्त्रसारा दुर्गासि दुर्गभवसागरनौरसङ्गा । श्रीः कैटभारिहृदयैककृताधिवासा गौरी त्वमेव शशिमौलिकृतप्रतिष्ठा ॥
हे देवी! आप मेधा (बुद्धि) हैं और समस्त शास्त्रों के सार को जानने वाली हैं। आप दुर्गा हैं जो संसाररूपी दुर्गम सागर से पार कराने वाली नौका हैं। आप लक्ष्मी हैं जो विष्णु के हृदय में निवास करती हैं और आप ही गौरी हैं जो चन्द्रमौलि शिव के मस्तक पर प्रतिष्ठित हैं।
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