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दुर्गासप्तशती • अध्याय 5 • श्लोक 10
शब्दात्मिका सुविमलर्ग्यजुषां निधान- मुद्गीथरम्यपदपाठवतां च साम्नाम् । देवि त्रयी भगवती भवभावनाय वार्तासि सर्वजगतां परमार्तिहन्त्री ॥
हे देवी! आप शब्दस्वरूप हैं, ऋक् और यजुः के शुद्ध ज्ञान की आधार हैं तथा सामवेद के मधुर गीतों की अधिष्ठात्री हैं। आप ही वेदत्रयी स्वरूप भगवती हैं और सम्पूर्ण जगत की परम पीड़ा का नाश करने वाली हैं।
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