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दुर्गासप्तशती • अध्याय 4 • श्लोक 26
वेगभ्रमणविक्षुण्णा मही तस्य व्यशीर्यत । लाङ्गूलेनाहतश्चाब्धिः प्लावयामास सर्वतः ॥
उसके तीव्र घूमने से पृथ्वी टूटने लगी और उसकी पूँछ के प्रहार से समुद्र भी चारों ओर उफनने लगा।
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