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दुर्गासप्तशती • अध्याय 3 • श्लोक 64
कबन्धाश्छिन्नशिरसः खड्गशक्त्यृष्टिपाणयः । तिष्ठ तिष्ठेति भाषन्तो देवीमन्ये महासुराः ॥
कुछ सिरविहीन कबन्ध तलवार, शक्ति और भाले लिए हुए देवी से कहते हुए लड़ रहे थे—रुको, रुको।
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