भ्रुवौ च सन्ध्ययोस्तेजः श्रवणावनिलस्य च । अन्येषां चैव देवानां सम्भवस्तेजसां शिवा ॥
संध्या के तेज से उसकी भौहें और वायु के तेज से उसके कान बने; इसी प्रकार अन्य देवताओं के तेज से भी उसके अंग प्रकट हुए।
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