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दुर्गासप्तशती • अध्याय 3 • श्लोक 17
तस्यास्तु दन्ताः सम्भूताः प्राजापत्येन तेजसा । नयनत्रितयं जज्ञे तथा पावकतेजसा ॥
उस देवी के दाँत प्रजापति के तेज से उत्पन्न हुए और अग्नि के तेज से उसके तीन नेत्र प्रकट हुए।
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