सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके । इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥
हे जगदम्बिके, मैं अपराधी हूँ और आपकी शरण में आया हूँ। अब मैं आपकी कृपा का पात्र हूँ, आप जैसी इच्छा हो वैसा करें।
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