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दुर्गासप्तशती • अध्याय 15 • श्लोक 1
ॐ अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत् । यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥
यदि कोई सैकड़ों अपराध करने के बाद भी “जगदम्बे” कहकर पुकारे, तो वह ऐसी गति प्राप्त करता है जिसे ब्रह्मा आदि देवता भी प्राप्त नहीं कर पाते।
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