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दुर्गासप्तशती • अध्याय 13 • श्लोक 17
उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः । दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥
इससे सभी उपद्रव शांत हो जाते हैं, भयंकर ग्रहपीड़ाएँ दूर हो जाती हैं और मनुष्य द्वारा देखा गया दुःस्वप्न शुभ स्वप्न में बदल जाता है।
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