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दुर्गासप्तशती • अध्याय 13 • श्लोक 16
शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने । ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं श‍ृणुयान्मम ॥
शांति कर्म के समय, दुःस्वप्न आने पर या भयंकर ग्रहपीड़ा होने पर मेरे इस माहात्म्य को सुनना चाहिए।
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