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दुर्गासप्तशती • अध्याय 12 • श्लोक 4
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि । अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥
आप ही पृथ्वी के रूप में स्थित होकर समस्त जगत का आधार बनी हुई हैं और जलस्वरूप में स्थित होकर आप ही इस सम्पूर्ण जगत को अपनी असीम शक्ति से पोषण करती हैं।
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