आप ही पृथ्वी के रूप में स्थित होकर समस्त जगत का आधार बनी हुई हैं और जलस्वरूप में स्थित होकर आप ही इस सम्पूर्ण जगत को अपनी असीम शक्ति से पोषण करती हैं।
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