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दुर्गासप्तशती • अध्याय 12 • श्लोक 34
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः । पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥
हे देवी, जैसे आपने अभी असुरों का वध करके हमें शत्रुओं के भय से मुक्त किया है, वैसे ही सदा हमारी रक्षा कीजिए। समस्त जगत के पापों को शीघ्र शांत कीजिए और उत्पातों तथा विपत्तियों से उत्पन्न महान संकटों को भी दूर कीजिए।
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