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दुर्गासप्तशती • अध्याय 12 • श्लोक 33
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीह विश्वम् । विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥
हे विश्वेश्वरी, आप ही इस विश्व की रक्षा करती हैं और विश्वात्मिका बनकर इसे धारण करती हैं। जो भक्तिभाव से आपके चरणों में झुकते हैं, वे भी संसार के लिए आश्रयस्वरूप और वंदनीय बन जाते हैं।
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