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दुर्गासप्तशती • अध्याय 12 • श्लोक 1
। ध्यानम् । ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्ताम् । स्मेरमुखीं वरदाङ्कुशपाशाभीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् । ॐ ऋषिरुवाच ॥
ध्यान: मैं भुवनेशी देवी की उपासना करता हूँ जो बाल सूर्य के समान दीप्तिमान हैं, जिनके मस्तक पर चन्द्रमुकुट है, जिनके उन्नत स्तन हैं, जो तीन नेत्रों से युक्त हैं, जिनका मुख मुस्कान से शोभित है और जो अपने हाथों में वरदान देने वाली मुद्रा, अंकुश, पाश तथा अभय प्रदान करने वाली मुद्रा धारण करती हैं। तब ऋषि ने कहा
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