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दुर्गासप्तशती • अध्याय 11 • श्लोक 3
बलावलेपदुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह । अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे चातिमानिनी ॥
हे दुर्गे, बल के अहंकार से दूषित होकर गर्व मत करो, क्योंकि तुम अन्य देवियों के बल का आश्रय लेकर युद्ध कर रही हो, हे अत्यन्त अभिमानी।
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