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दुर्गासप्तशती • अध्याय 11 • श्लोक 2
निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम् । हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥
अपने प्राणों के समान प्रिय भाई निशुम्भ को मरा हुआ और अपनी सेना को नष्ट होते देखकर शुम्भ क्रोधित होकर यह वचन बोला।
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