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चतुर्वेद • अध्याय 1 • श्लोक 4
पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसन्निभम्। हृदये चाप्यधोमुखं सतस्यत्यैशीत्कराभिश्च ॥
हृदय का स्वरूप कमल की कली के समान माना गया है, जो एक आवरणयुक्त कोश के सदृश लटका हुआ प्रतीत होता है। वह हृदयकमल नीचे की ओर मुख किए हुए स्थित है और उसकी सूक्ष्म रचनाएँ अनेक नाड़ियों द्वारा परिवेष्टित रहती हैं।
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