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चाणक्य नीति • अध्याय 9 • श्लोक 5
दुतो न सञ्चरति खे न चलेच्च वार्ता । पुर्व न जल्पितमिदं न च सड्गमोऽस्ति । व्योम्नि स्थितं रविशाशग्रहणं प्रशस्तं जानाति यो द्विजवरः सकथं न विद्वान् ।।
कोई संदेशवाहक आकाश में जा नहीं सकता और आकाश से कोई खबर आ नहीं सकती। वहा रहने वाले लोगो की आवाज सुनाई नहीं देती। और उनके साथ कोई संपर्क नहीं हो सकता। इसीलिए वह ब्राह्मण जो सूर्य और चन्द्र ग्रहण की भविष्य वाणी करता है, उसे विद्वान मानना चाहिए।
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