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चाणक्य नीति • अध्याय 9 • श्लोक 2
परस्परस्य मर्माणि ये भाषन्ते नराधमाः । त एव विलयं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ।।
वो कमीने लोग जो दूसरो की गुप्त खामियों को उजागर करते हुए फिरते है, उसी तरह नष्ट हो जाते है जिस तरह कोई साप चीटियों के टीलों में जा कर मर जाता है।
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