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चाणक्य नीति • अध्याय 9 • श्लोक 1
मुक्तिमिच्छासि चेत्तात ! विषयान् विषवत्त्यज । क्षमाऽऽर्जवं दया शौचं सत्यं पीयूषवत्पिब ।।
तात, यदि तुम जन्म मरण के चक्र से मुक्त होना चाहते हो तो जिन विषयो के पीछे तुम इन्द्रियों की संतुष्टि के लिए भागते फिरते हो उन्हें ऐसे त्याग दो जैसे तुम विष को त्याग देते हो। इन सब को छोड़कर हे तात तितिक्षा, ईमानदारी का आचरण, दया, शुचिता और सत्य इसका अमृत पियो।
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