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चाणक्य नीति • अध्याय 8 • श्लोक 4
वित्तंदेहि गुणान्वितेष मतिमन्नाऽन्यत्रदेहि क्वचित् । प्राप्तं वारिनिधेर्जलं घनमुचां माधुर्ययुक्तं सदा। जीवाः स्थावरजड्गमाश्च सकला संजीव्य भूमण्डलं । भूयः पश्यतदेवकोटिगुणितंगच्छस्वमम्भोनिधिम् ।।
हे विद्वान् पुरुष ! अपनी संपत्ति केवल पात्र को ही दे और दूसरो को कभी ना दे। जो जल बादल को समुद्र देता है वह बड़ा मीठा होता है। बादल वर्षा करके वह जल पृथ्वी के सभी चल अचल जीवो को देता है और फिर उसे समुद्र को लौटा देता है।
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