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चाणक्य नीति • अध्याय 8 • श्लोक 22
मांसभक्षैः सुरापानैः मूर्खैश्चाऽक्षरवर्जितैः । पशुभि पुरुषाकारर्भाराक्रान्ताऽस्ति मेदिनी ।।
यह धरती उन लोगो के भार से दबी जा रही है, जो मास खाते है, दारू पीते है, बेवकूफ है, वे सब तो आदमी होते हुए पशु ही है।
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