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चाणक्य नीति • अध्याय 8 • श्लोक 14
क्रोधो वैवस्वतो राहा तृष्णा वैतरणी नदी । विद्या कामदुधा धेनुः सन्तोषो नन्दनंवनम् ।।
क्रोध साक्षात् यम है। तृष्णा नरक की और ले जाने वाली वैतरणी है। ज्ञान कामधेनु है। संतोष ही तो नंदनवन है।
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