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चाणक्य नीति • अध्याय 7 • श्लोक 9
तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा घनगर्जिते । साधवः परसम्पत्तौ खलाः परविपत्तिषु ।।
ब्राह्मण अच्छे भोजन से तृप्त होते है। मोर मेघ गर्जना से। साधू दुसरो की सम्पन्नता देखकर और दुष्ट दुसरो की विपदा देखकर।
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