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चाणक्य नीति • अध्याय 7 • श्लोक 5
विप्रयोर्विप्रह्नेश्च दम्पत्यॊः स्वामिभृत्ययोः । अन्तरेण न गन्तव्यं हलस्य वृषभस्म च ।।
इन दोनों के मध्य से कभी ना जाए - १. दो ब्राह्मण २. ब्राह्मण और उसके यज्ञ में जलने वाली अग्नि ३. पति पत्नी ४. स्वामी और उसका चाकर ५. हल और बैल
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