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चाणक्य नीति • अध्याय 7 • श्लोक 14
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीस्त्र व इवाम्भसाम् ।।
संचित धन खर्च करने से बढ़ता है। उसी प्रकार जैसे ताजा जल जो अभी आया है बचता है, यदि पुराने स्थिर जल को निकल बहार किया जाये।
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