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चाणक्य नीति • अध्याय 5 • श्लोक 4
एकोदरसमुद् भूता एकनक्षत्रजातकाः । न भवन्ति समाः शीला यथा बदरिकण्टकाः ।।
अनेक व्यक्ति जो एक ही गर्भ से पैदा हुए है या एक ही नक्षत्र में पैदा हुए है वे एकसे नहीं रहते। उसी प्रकार जैसे बेर के झाड के सभी बेर एक से नहीं रहते।
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