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चाणक्य नीति • अध्याय 5 • श्लोक 20
चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणश्चले जीवितमन्दिरे । चलाऽचले च संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।।
लक्ष्मी जो संपत्ति की देवता है, वह चंचला है। हमारी श्वास भी चंचला है। हम कितना समय जियेंगे इसका कोई ठिकाना नहीं। हम कहा रहेंगे यह भी पक्का नहीं। कोई बात यहाँ पर पक्की है तो यह है की हमारा अर्जित पुण्य कितना है।
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