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चाणक्य नीति • अध्याय 5 • श्लोक 14
तृणं ब्रह्मविदः स्वर्गस्तृणं शूरस्य जीवितम् । जिताक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत् ।।
जिसने अपने स्वरुप को जान लिया उसके लिए स्वर्ग तो तिनके के समान है। एक पराक्रमी योद्धा अपने जीवन को तुच्छ मानता है। जिसने अपनी कामना को जीत लिया उसके लिए स्त्री भोग का विषय नहीं। उसके लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तुच्छ है जिसके मन में कोई आसक्ति नहीं।
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