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चाणक्य नीति • अध्याय 4 • श्लोक 8
कुग्रामवासः कुलहीनसेवा । कुभोजनं क्रोधमुखी च भार्या ।। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या । विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम् ।।
निम्नलिखित बाते व्यक्ति को बिना आग के ही जलाती है - १. एक छोटे गाव में बसना जहा रहने की सुविधाए उपलब्ध नहीं २. एक ऐसे व्यक्ति के यहाँ नौकरी करना जो नीच कुल में पैदा हुआ है ३. अस्वास्थय्वर्धक भोजन का सेवन करना ४. जिसकी पत्नी हरदम गुस्से में होती है ५. जिसको मुर्ख पुत्र है ६. जिसकी पुत्री विधवा हो गयी है
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