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चाणक्य नीति • अध्याय 4 • श्लोक 5
कामधेनुगुण विद्या ह्यकाले फलदायिनी । प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ।।
विद्या अर्जन करना यह एक कामधेनु के समान है। जो हर मौसम में अमृत प्रदान करती है। वह विदेश में माता के समान रक्षक अवं हितकारी होती है। इसीलिए विद्या को एक गुप्त धन कहा जाता है।
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