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चाणक्य नीति • अध्याय 3 • श्लोक 6
प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः। सागरा भेदमिच्छान्ति प्रलयेऽपि न साधवः ।।
जब प्रलय का समय आता है तो समुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़कर किनारों को छोड़ अथवा तोड़ जाते है, लेकिन सज्जन पुरुष प्रलय के सामान भयंकर आपत्ति अवं विपत्ति में भी आपनी मर्यादा नहीं बदलते।
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