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चाणक्य नीति • अध्याय 2 • श्लोक 7
मनसा चिन्तितं कार्य वचसा न प्रकाशयेत् । मंत्रेण रक्षयेद् गूढं कायं चापि नियोजयेत् ।।
मन में सोचे हुए कार्य को किसी के सामने प्रकट न करें बल्कि मनन पूर्वक उसकी सुरक्षा करते हुए उसे कार्य में परिणत कर दें।
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