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चाणक्य नीति • अध्याय 2 • श्लोक 6
न विवसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् । कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वगृह्य प्रकाशयेत् ।।
एक बुरे मित्र पर तो कभी विश्वास ना करे। एक अच्छे मित्र पर भी विश्वास ना करें। क्यूंकि यदि ऐसे लोग आपसे रुष्ट होते है तो आप के सभी राज से पर्दा खोल देंगे।
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