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चाणक्य नीति • अध्याय 2 • श्लोक 5
परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भम्पयोमुखम् ।।
ऐसे लोगों से बचे जो आपके मुह पर तो मीठी बातें करते हैं, लेकिन आपके पीठ पीछे आपको बर्बाद करने की योजना बनाते हैं, ऐसा करने वाले तो उस विष के घड़े के समान है जिसकी उपरी सतह दूध से भरी है।
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