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चाणक्य नीति • अध्याय 2 • श्लोक 19
दुराचारी दुरादृष्टिर्दुरावासी च दुर्जनः। यन्मैत्रीक्रियते पुम्भिर्नर-शीघ्रं विनश्यति ।।
जो व्यक्ति दुराचारी, कुदृष्टि वाले, एवं बुरे स्थान पर रहने वाले मनुष्य के साथ मित्रता करता है, वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
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