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चाणक्य नीति • अध्याय 17 • श्लोक 5
पिता रत्नाकरो यस्य लक्ष्मीर्यस्य सहोदरी । शञ्खो भिक्षाटनं कुर्यान्न दत्तमुपतिष्ठति ।।
समुद्र ही सभी रत्नों का भण्डार है। वह शंख का पिता है। देवी लक्ष्मी शंख की बहन है। लेकिन दर दर पर भीख मांगने वाले हाथ में शंख ले कर घूमते है। इससे यह बात सिद्ध होती है की उसी को मिलेगा जिसने पहले दिया है।
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