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चाणक्य नीति • अध्याय 17 • श्लोक 15
दानार्थिनो मधुकरा यदि कर्णतालै दूरीकृता करिवरेण मदान्धबुद्धया । तस्यैव गण्डयुगमण्डनहानिरेव भृङ्गाः पुनर्विकचपद्मवने वसन्ति ।।
यदि मद मस्त हाथी अपने माथे से टपकने वाले रस को पीने वाले भौरों को कान हिलाकर उड़ा देता है, तो भौरों का कुछ नहीं जाता, वे कमल से भरे हुए तालाब की ओर ख़ुशी से चले जाते है। हाथी के माथे का शृंगार कम हो जाता है।
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