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चाणक्य नीति • अध्याय 17 • श्लोक 12
नापितस्य गृहे क्षौरं पाषाणे गन्धलेपनम् । आत्मरूपं जले पश्यन् शक्रस्यापि श्रियं हरेत् ।।
जिसमे सभी जीवो के प्रति परोपकार की भावना है वह सभी संकटों पर मात करता है और उसे हर कदम पर सभी प्रकार की सम्पन्नता प्राप्त होती है।
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