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चाणक्य नीति • अध्याय 17 • श्लोक 10
दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन । मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन ।।
एक हाथ की शोभा गहनों से नहीं दान देने से है। चन्दन का लेप लगाने से नहीं जल से नहाने से निर्मलता आती है। एक व्यक्ति भोजन खिलाने से नहीं सम्मान देने से संतुष्ट होता है। मुक्ति खुद को सजाने से नहीं होती, अध्यात्मिक ज्ञान को जगाने से होती है।
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