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चाणक्य नीति • अध्याय 16 • श्लोक 7
अतिक्लेशेन ये चार्थाः धर्मस्यातिक्रमेण तु । शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्थाः न भवन्तु मे ।।
वह व्यक्ति जो सर्व गुण संपन्न है अपने आप को सिद्ध नहीं कर सकता है जबतक उसे समुचित संरक्षण नहीं मिल जाता। उसी प्रकार जैसे एक मणि तब तक नहीं निखरता जब तक उसे आभूषण में सजाया ना जाए।
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