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चाणक्य नीति • अध्याय 16 • श्लोक 6
विवेकिनमनुप्राप्तो गुणो याति मनोज्ञताम् । सुतरां रत्नमाभाति चामीकरनियोजितम् ।। गुणं सर्वत्र तुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः । अनर्घ्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते ।।
यदि एक विवेक संपन्न व्यक्ति अच्छे गुणों का परिचय देता है तो उसके गुणों की आभा को रत्न जैसी मान्यता मिलती है. एक ऐसा रत्न जो प्रज्वलित है और सोने के अलंकर में मढने पर और चमकता है।
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