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चाणक्य नीति • अध्याय 16 • श्लोक 5
परमोक्तगुणो यस्तु निर्गुणोऽपि गुणी भवेत् । इन्द्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः ।।
जो व्यक्ति गुणों से रहित है लेकिन जिसकी लोग सराहना करते है वह दुनिया में काबिल माना जा सकता है। लेकिन जो आदमी खुद की ही डींगे हाकता है वो अपने आप को दुसरे की नजरो में गिराता है भले ही वह स्वर्ग का राजा इंद्र हो।
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