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चाणक्य नीति • अध्याय 16 • श्लोक 4
गुणैरुत्तमतां यान्ति नोच्चैरासनसंस्थितैः । प्रसादशिखरस्थोऽपि किं काको गरुडायते ।। गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते न महत्योऽपि सम्पदः । पूर्णेन्दु किं तथा वन्द्यो निष्कलङ्को यथा कुशः ।।
व्यक्ति को महत्ता उसके गुण प्रदान करते है वह जिन पदों पर काम करता है सिर्फ उससे कुछ नहीं होता। क्या आप एक कौवे को गरुड़ कहेंगे यदि वह एक ऊँची ईमारत के छत पर जाकर बैठता है।
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