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चाणक्य नीति • अध्याय 16 • श्लोक 15
जन्मजन्मनि चाभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः । तेनैवाभ्यासयोगेन देहि वाऽभ्यस्यते ।।
पहले के जन्मो की अच्छी आदते जैसे दान, विद्यार्जन और तप इस जनम में भी चलती रहती है। क्योकि सभी जनम एक श्रुंखला से जुड़े है।
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