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चाणक्य नीति • अध्याय 16 • श्लोक 12
वरं वनं व्याघ्रगजेन्द्रसेवितं द्रुमालयं पक्वफलाम्बुसेवनं । तृणेषु शय्या शतजीर्णवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीन जीवनम् ।।
बेइज्जत होकर जीने से अच्छा है की मर जाए। मरने में एक क्षण का दुःख होता है पर बेइज्जत होकर जीने में हर रोज दुःख उठाना पड़ता है।
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