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चाणक्य नीति • अध्याय 15 • श्लोक 7
अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम् । अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकरभूषणम् ।।
एक महान आदमी जब कोई गलत काम करता है तो उसे कोई कुछ नहीं कहता। एक नीच आदमी जब कोई अच्छा काम भी करता है तो उसका धिक्कार होता है। देखिये अमृत पीना तो अच्छा है लेकिन राहू की मौत अमृत पिने से ही हुई। विष पीना नुकसानदायी है लेकिन भगवान् शंकर ने जब विष प्राशन किया तो विष उनके गले का अलंकार हो गया।
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