हे भगवान् विष्णु, मेरे स्वामी, मै ब्राह्मणों के घर में इस लिए नहीं रहती क्योंकी अगस्त्य ऋषि ने गुस्से में समुद्र को ( जो मेरे पिता है) पी लिया। भृगु मुनि ने आपकी छाती पर लात मारी। ब्राह्मणों को पढने में बहोत आनंद आता है और वे मेरी जो स्पर्धक है उस सरस्वती की हरदम कृपा चाहते है और वे रोज कमल के फूल को जो मेरा निवास है जलाशय से निकलते है और भगवान् शिव की पूजा करते है।
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