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चाणक्य नीति • अध्याय 15 • श्लोक 16
पीतः क्रुध्देन तातश्चरणतलहता वल्लभो येन रोषा- दाबाल्याद्विप्रवर्यैः स्ववदनविवरे धार्यते वैरिणी में । गेहं मे छेदयन्ति प्रतिदिवसमुमाकान्तपूजानिमित्तं तस्मात्खिन्नासदात्हंद्विजकुलनिलयं नाथ युक्तं त्यजामि ।।
हे भगवान् विष्णु, मेरे स्वामी, मै ब्राह्मणों के घर में इस लिए नहीं रहती क्योंकी अगस्त्य ऋषि ने गुस्से में समुद्र को ( जो मेरे पिता है) पी लिया। भृगु मुनि ने आपकी छाती पर लात मारी। ब्राह्मणों को पढने में बहोत आनंद आता है और वे मेरी जो स्पर्धक है उस सरस्वती की हरदम कृपा चाहते है और वे रोज कमल के फूल को जो मेरा निवास है जलाशय से निकलते है और भगवान् शिव की पूजा करते है।
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