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चाणक्य नीति • अध्याय 15 • श्लोक 14
अयममृतनिधानं नायकोऽप्यौषधीनां । अमृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः ।। भवति विगतरश्मिर्मण्डलं प्राप्य भानोः । परसदननिविष्टः को लघुत्वं न याति ।।
चन्द्रमा जो अमृत से लबालब है और जो औषधियों की देवता माना जाता है, जो अमृत के समान अमर और दैदीप्यमान है। उसका क्या हश्र होता है जब वह सूर्य के घर जाता है अर्थात दिन में दिखाई देता है। तो क्या एक सामान्य आदमी दुसरे के घर जाकर लघुता को नहीं प्राप्त होगा।
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