अनन्तंशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पं च कालो बहुविघ्नता च ।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवम्बुमध्यात् ।।
शास्त्रों का ज्ञान अगाध है। वो कलाए अनंत जो हमें सीखनी छाहिये। हमारे पास समय थोडा है। जो सिखने के मौके है उसमे अनेक विघ्न आते है। इसीलिए वही सीखे जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसी प्रकार जैसे हंस पानी छोड़कर उसमे मिला हुआ दूध पी लेता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
चाणक्य नीति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
चाणक्य नीति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।