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चाणक्य नीति • अध्याय 15 • श्लोक 10
अनन्तंशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पं च कालो बहुविघ्नता च । यत्सारभूतं तदुपासनीयं, हंसो यथा क्षीरमिवम्बुमध्यात् ।।
शास्त्रों का ज्ञान अगाध है। वो कलाए अनंत जो हमें सीखनी छाहिये। हमारे पास समय थोडा है। जो सिखने के मौके है उसमे अनेक विघ्न आते है। इसीलिए वही सीखे जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसी प्रकार जैसे हंस पानी छोड़कर उसमे मिला हुआ दूध पी लेता है।
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